“करवा चौथ”

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Karwa Chauth

भारतीय त्यौहारों की परंपरा से सम्बंधित एक त्यौहार ऐसा भी है जिसे सौभाग्यशाली नारी त्यौहार कहा जाता है। इस त्यौहार को सभी “करवा चौथ” के नाम से जानते हैं। इस व्रत का सौभाग्य सभी सुहागन महिलाओं को प्राप्त है। महिलाएं अपने पति की लम्बी उम्र व् अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए यह व्रत करती हैं।

अगर आज के दौर की बात की जाए तो आज के युवा बहुत आधुनिक सोच रखते हैं। इसलिए आजकल केवल महिलाएं ही नहीं पुरुष भी अपनी पत्नी का साथ देने के लिए व्रत रखते हैं।
करवा चौथ कब मनाया जाता है?

भारतीय महीनों के अनुसार यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। करवा चौथ कृष्ण पक्ष की तृत्य को सरगी के नाम से शुरू हो जाता है। और चतुर्थी को व्रत उपवास होता है। सरगी के नाम पर घर में कुछ मीठा, हलवा या सेवइयां आदि बनाया जाता है। इस दौरान सासु माँ अपनी बहु को कुछ वस्त्र, गहने, श्रृंगार का सामान -चूड़ियां, बिंदी, सिन्दूर, लिपस्टिक, नेल पेंट भेंट करती है। साथ ही कुछ न कुछ खाने पीने की सामग्री भी बहु को सासु माँ द्वारा सरगी के रूप में दी जाती है। करवा चौथ के व्रत से पहले यही सरगी खाकर वह अपने पति की लम्बी आयु व् सुख समृद्धि की कामना करते हुए व्रत प्रारम्भ करती है।

करवा चौथ की शुरुवात कब से हुई?

Karwa Chauth कहते हैं कि हर कार्य के पीछे कोई न कोई वजह होती है। भारत में जितने भी त्यौहार मनाए जाते हैं उनके पीछे कोइ न कोई कारण, कथा, कहानी है। उसी प्रकार कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का महत्व करवा चौथ के रूप में हैं।
कथा 1.

कहा जाता है कि एक बार देवों और दानवों में भयंकर युद्ध हुआ। संकट की स्थिति में भगवान ब्रह्म देव ने देवताओं की पत्नियों के समक्ष अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि वह सभी स्त्रियां अपने अपने पति की लम्बी आयु के लिए चंद्र देवता का पूजन करें। वह दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का दिन था।

सभी देवताओं की पत्नियों ने ब्रह्म देव द्वारा बताए गए पूजन को विधि पूर्वक किया जिससे सभी देवों को युद्ध में विजय प्राप्त हुई। चन्द्रमा को आयु और शीतलता का कारक माना जाता है। इस प्रकार सबसे पहले यह व्रत माँ पार्वती ने शिव जी के लिए रखा और तभी से इस व्रत की परंपरा चली आरही है।

कथा 2.

महाभारत में भी इस व्रत की विशेषता दर्शाई गई है। जब अर्जुन नीलगिरी पर्वत पर तपस्या करने गए तब पांडवों पर कईं प्रकार से संकट आने लगे। सभी संकटों से भयभीत द्रौपदी भगवान कृष्ण की शरण में गई। भगवान कृष्ण से अपनी समस्याएं बताई और उनका उपाय पूछा। तब भगवान श्री कृष्ण ने बताया कि हिन्दू परंपरा में कार्तिक मास का विशेष महत्व होता है। तथा कार्तिक मास की चतुर्थी को करवा माता और चंद्र देव का पूजन सभी संकटों को दूर करने वाला होता है। ऐसा बता कर श्री कृष्ण ने द्रौपदी को व्रत करने को कहा।

तब द्रौपदी ने श्रद्धा पूर्वक निर्जल रह कर विधि पूर्वक करवा व्रत किया और चन्द्रमा व् शिव परिवार की पूजा की। जिसके बाद पांडवों को सभी संकटों से मुक्ति प्राप्त हुई। इस प्रकार इस दिन की विशेषता और बढ़ गई।

करवा चौथ व्रत के लिए क्या-क्या सामग्री की आवश्यकता होती है Karwa Chauth

मिटटी का टोंटीदार करवा, इसका ढक्कन, थाली, सिन्दूर, चावल, रोली, मोली, छलनी, दीपक, रुई बत्ती, घी, दूब(दुर्बा), पीली मिटटी, लकड़ी की चौंकी, फल मिठाई, माचिस और सरगी।

यह त्यौहार महिलाओं में बेहद जोश भर देता है। करवा चौथ का त्यौहार महिलाओं के लिए किसी ब्यूटी कांटेस्ट से कम नहीं होता। जिसकी तैयारी महिलाएं महीनों पहले करनी शुरू कर देती हैं। इस दिन महिलाएं खूब सजती संवरती हैं। बाज़ारों में रौनक और सबमें इस त्यौहार को लेकर उमंग करवा चौथ को और ख़ास बना देती हैं।

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सरगी की परंपरा | किसे कहते हैं सरगी!?

करवा चौथ से पहले दिन सास अपनी बहु को 16 श्रृंगार का सामान देती है। साथ ही मेहँदी, फेनिया, मिठाई व् फल इत्यादि भी शगुन के तौर पर सरगी के रूप में देती हैं। नारियल का सरगी में विशेष महत्व है। व्रत से कुछ दिन पहले ही महिलाएं अपने हाथों में मेहँदी लगवा लेती हैं।

जिस दिन व्रत हो उस दिन प्रातः काल 4 बजे व्रत शुरू करने से पहले कुछ खानपान जैसे कि मिठाई, फल, अनाज, दूध इत्यादि खाया जाता है। इस समय खाने को लेकर सभी के अपने अपने रिवाज भी हो सकते हैं। ये सब सामग्री सासु माँ द्वारा एक दिन पहले ही दे दी जाती है। इसी प्रथा को सरगी कहते हैं।

करवा व्रत की पूजन विधि

सरगी के बाद व्रत प्रारम्भ हो जाता है। उसके बाद जल भी ग्रहण नहीं करना होता। महिलाएं अपने दिनचर्या के ख़ास काम निपटा कर बाकि समय अपने सजने सवारने में व्यतीत करती हैं। आखिर साल में एक ये ही तो ख़ास दिन आता है जब महिलाएं घंटो पार्लर में बिता कर 16 श्रृंगार करती हैं। नए वस्त्र पहनती हैं। अपने पति के लिए रखे इस ख़ास व्रत में चार चाँद लगाती हैं।

दोपहर के समय करवा माता अर्थात माँ पार्वती संग शिव परिवार का पूजन कर पति की दीर्घायु और सुख समृद्धि की मंगल कामना करती है। करवा माता जिन्हें कि गौरी माता भी कहते हैं वह देवी माँ पार्वती का ही अवतार हैं। यह देवी लम्बे और सुखी विवाहित जीवन का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।

करवा चौथ की पूजन विधि अलग अलग राज्यों में अलग अलग ढंग से होती है। जैसे कि हरियाणा- पंजाब में कुछ केवल कहानी पढ़ सुनकर माँ गौरी की पूजा करते हैं और फिर बायना निकालते हैं। वहीं कुछ महिलाएं आपस में थालियों को घूमने वाली रीत करती हैं।

जहाँ कुछ लोग करवा में गंगाजल, शहद, कच्चा दूध, थोड़े से चावल और जल भरते हैं। वहीं कुछ लोग करवा में गेंहू भरते हैं। और कुछ चावल व् साधारण पानी भरते हैं।

दोपहर के समय एक थाली में कुछ मठ्ठियाँ, पेठा, फल, मेवे, नए वस्त्र और कुछ रूपए रखकर बायने की थाली तैयार की जाती हैं। इसी में एक मोली, सिन्दूर, थोड़े से चावल भी रखे जाते हैं। शाम के समय 2 बजे से 5 बजे के बीच किसी भी समय यह रीत की जाती है। जिसमें करवा, करवे के ऊपर स्वास्तिक बनाकर तथा मौली बाँध कर तिलक लगाए जाते हैं। व्रत रखने वाली स्त्री करवे और बायने वाली थाली को लकड़ी की चौंकी पर रखती है। फिर इसकी चारों ओर 2 बार पानी हाथ में लेकर घूमती है। फिर करवा चौथ की कथा पढ़ती/ सुनती है। इसके बाद यह थाली सासु माँ को देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करती है।

बायने के बाद अपने अपने रीती रिवाज के अनुसार व्रती दूध, चाय, पानी पी सकती है। यदि किसी के यहाँ ये रिवाज़ न हो तो वह रात को ही चन्द्रमा देख कर ही कुछ ग्रहण हैं।

थाली घुमाने की प्रथा

जिनके यहाँ थाली घुमाने की प्रथा होती हो, वे थाली तो उसी प्रकार तैयार करते हैं। जैसा कि ऊपर बताया गया है। सभी महिलाएं एक जगह एकत्रित होती हैं। एक स्थान को शुद्ध कर वहां लकड़ी की चौंकी रखी जाती है। उसके ऊपर पीली मिटटी की माँ गौरी की प्रतिमा बनाकर रखी जाती है। फिर सभी माँ गौरी ओर गणेश जी को तिलक लगाकर उनकी पूजा करती हैं। उन्हें फल, फूल व् मिठाई अर्पित की जाती है।

जब सभी यह पूजन कर लें इसके बाद फिर सभी स्त्रियां एकत्रित हो 7 या 11 के गुट में गोल चक्र बनाकर बैठती हैं। और अपनी अपनी थाली अपने साथ बैठी स्त्री को आगे पकड़ाती जाती हैं। इस प्रक्रिया को थाली घुमाना कहते हैं। और यह 7 बार दोहराई जाती है। इस दौरान एक गीत भी गया जाता है-

“वीरो कुड़िये करवड़ा, सर्व सुहागन करवड़ा
कत्ती ना अटेरी ना, घूम चरखड़ा फेरी ना
गवाद पैर पाई न, सुई च धागा पाई न
रूठड़ा मनाई न, सुतड़ा जगाई न
वीरो कुड़िये करवड़ा, सर्व सुहागन करवड़ा”

इसके बाद ये थाली अपनी सासु माँ को देकर उनसे आशीर्वाद लिया जाता है। इस प्रथा के बाद अपने अपने रिवाज़ अनुसार चाय दूध पिया जा सकता है।

रात को चाँद देख कर व्रत खोलना | अर्ध्य विधि

इस रात चाँद का कुछ ज़्यादा ही बेसब्री से इंतज़ार किया जाता है। सब लोग बार बार आसमान की ओर देखकर चाँद के आने की राह देखते हैं। जब चाँद दिख जाता है तब चारों ओर पटाखों की गूँज सुनाई देती है। फिर सभी उस स्थान पर जाते हैं जहाँ से चाँद दिखाई दे और प्रथा पूरी की जा सके। महिलाएं और साथ में मर्द जिन्होंने व्रत रखा है, वे सब मिलकर एक पानी भरे करवे में हाथ लगा कर चन्द्रमा का पूजन करते हैं। दोपहर के समय कहानी के समय हाथ में ली गए चावल इत्यादि से चंद्र देवता का माथा टेकती हैं।

आम भाषा में अर्ध्य देते समय यह बोलते हैं-
“स्युनियाँ पर स्युनियाँ, स्युनियाँ पर वार
बाला चंदा अर्ध्य दे, तारों को भी दे
हाथ मेहंदी पल्ला पूड़ी सुहागवती अर्ध्य दे”

7 बार ऐसा करने के बाद करवे का जल चन्द्रमा को समर्पित किया जाता है। कुछ लोगों के यहाँ छलनी से या छेद वाली मठ्ठी से चाँद देखने की प्रथा होती है। तो कुछ सामने से ही सीधे चन्द्रमा के दर्शन कर आशीर्वाद लेते हैं। पल्ले में पूड़ी नामक सामान जिसमें मिठाई व् फल तथा मौली होती हैं, इसमें से प्रशाद वितरित करदिया जाता है। तथा अपने बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है। पति अपने हाथों से अपनी पत्नी को पानी पिलाकर व्रत पूर्ण करवाते हैं। इसके पश्चात् पति पत्नी मिलकर भोजन करते हैं।

इस प्रकार प्रेम व् सम्मान का प्रतीक यह त्यौहार सुबह से रात तक उत्साह के साथ मनाया जाता है। कुछ लोगों को भारत की यह परम्पराएं व् त्यौहार बेशक पुराने व् आज के दौर से कोसों दूर लगते हों। लेकिन यह ऐसे मौके होते हैं जहाँ पति पत्नी के बीच प्रेम रूपी पौधे को नए स्तर की ऊर्जा मिलती है। तथा यह रिश्ता और फलता फूलता है।
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Priyanka G

Writer | VO Artist | TV Presenter | Entrepreneur

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