“अहोई अष्टमी”

Ahoi Ashtami

भारत के बहुत से त्यौहारों को देख कर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हिन्दू कैलेंडर के अनुसार कार्तिक मास कितना महत्वपूर्ण है। इस लेख में जानिए कि-
अहोई अष्टमी कब मनाई जाती है?
क्यों मनाई जाती है?
कैसे मनाई जाती है?
अहोई अष्टमी मानाने की पूर्ण विधि
बायना, झकरा, अर्घ्य विधि के बारे में जानकारी
अहोई अष्टमी की कथा

कब मनाई जाती है अहोई अष्टमी

कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी का दिन “अहोई अष्टमी” के नाम से जाना जाता है। जिस प्रकार कार्तिक मास की कृष्ण की चतुर्थी को “करवाचौथ” का त्यौहार पति की लम्बी आयु के लिए मनाया जाता है। उसी तरह इसी मास की अष्टमी के दिन अहोई माता की पूजा अपनी संतान की उन्नति, कल्याण और दीर्घायु के लिए की जाती है।

क्यों मनाई जाती है अहोई

कार्तिक मास की अमावस्या को दीपावली मनाए जाने की तैयारियां शुरू हो जाती है। जिसके तहत पहले लोग स्वयं जाकर मिट्टी खोदकर लाया करते थे। और फिर अपने घरों की लिपाई पुताई स्वयं ही किया करते थे। अहोई अष्टमी व्रत का कारण दीपावली की तैयारी से ही सम्बंधित है।”साहुकार की लड़की अपने भाइयों के साथ मिट्टी लेने जाती है। मिट्टी खोदते समय उस का खुरपा (जिस से मिट्टी खोदी जाती है), सही की नांद पर लग जाता है और उससे सही के बच्चे की मृत्यु हो जाती है। जिससे आहात सही ने उसे श्राप दिया कि उसके कभी बच्चा नहीं होगा अर्थात उस की कोख बाँध दी। इसी श्राप को ख़त्म करने यानि इससे मुक्त होने के लिए पश्चाताप व् पूजा की जिस के बाद सभी स्त्रियां अपनी अपनी संतान की दीर्घायु के लिए इस दिन अहोई माता का व्रत पूजन करती हैं।

कैसे मनाई जाती है अहोई अष्टमी

पहले समय में ‘नाश्ता’ नामक खान पान का प्रचलन नहीं था। प्रातः काल काम पर जाने से पहले ही कुछ खा पी लिया जाता था और प्रातः 4 बजे से ही काम काज करना शुरू कर दिया करते थे। मिट्टी लेने गई नन्द भाभियाँ घर से कुछ खा कर ही गई थी। यही से सरगी का रिवाज़ बन गया (यानि व्रत शुरू करने से पहले प्रातः 4 बजे खाना)। इसे सरगी कहते हैं। और यह सरगी सासु माँ द्वारा अपनी बहु को दी जाती है।

अहोई अष्टमी के लिए सामग्री तथा विधि

गाय का गोबर, कच्चे चावल, गेरू, रौली, हल्दी, मौली, धुप, दीप, देसी घी, कलश, लाल रंग का वस्त्र, जल, गंगा जल और एक झकरा (मिट्टी का पात्र), मिठाई, फल, पकवान और एक चांदी की अहोई माता।शारीरिक शुद्धता के बाद कच्चे चावलों को भिगोकर पीसा जाता है। गेरू को भी पीस कर पानी से घोल लिया जाता है। दीवार पर एक चकोर भाग पर गोबर लीप कर शुद्ध कर लिया जाता है। इसी भाग में गेरू तथा चावल की पीसी हुई घोल से अहोई माता बनाई जाती है। आठ कोष्ठक की पुतली साही और उस के बच्चों की आकृतियां बनाई जाती है। इसी में भगवान शिव, पार्वती तथा गणेश जी की आकृति बनाई जाती है। एक पेड़ और गरुड़ पंखिनी और गाय व् उसका बछड़ा इत्यादि बनाकर सुसज्जित कर लिया जाता है। वैसे आज कल इस सभी का तैयार किया हुआ एक कैलेंडर भी आज कल बाज़ार में मिल जाता है। जो लोग ये सब दीवार पर नहीं बना पाते वे बाज़ार से बना बनाया लेकर घर में लगा सकते हैं।

पूजन कैसे किया जाता है

दुनिया की हर माँ अपने बच्चे से बहुत प्यार करती है। वैसे तो माँ हर हालात में, हर समय अपने बच्चे की दीर्घायु और सुख समृद्धि की कामना करती है। लेकिन यह दिन एक माँ के लिए विशेष होता है। जिस दिन वह भूखी प्यासी रह कर भगवान को मनाती है कि उसके बच्चों को भगवान हमेशा सलामत रखे, लम्बी आयु दे और सदैव नेक व् उन्नति की राह पर चले।अहोई अष्टमी के दिन माताएं व्रत रखती हैं। शुद्धता के साथ सुन्दर वस्त्र पहन कर अहोई माता की पूजा करती हैं। साथ ही शिव जी माँ पार्वती और गणेश जी को भी पूजा जाता है। पार्वती माँ के नौ रूप ही है जिन के अलग अलग रूपों की पूजा होती है।

शाम को कथा पूजन

अहोई माता की पूजा शाम के समय की जाती है। शाम को महिलाएं अहोई माता की कथा पढ़ती सुनती हैं। कहानी सुनते- सुनाते समय एक जल का पात्र भर कर रखा जाता है। सभी अपने अपने हाथ में थोड़ी सी दुर्बा व् कच्चे चावल रखे जाते हैं। कहानी सुनने के बाद जल भरा पात्र, चावल व् दुर्बा रख लिया जाता है। जो कि रात को अर्ध्य देने के समय माथा टेकने में इस्तेमाल होती हैं। कहानी के बाद रीती अनुसार दूध या चाय लिया जासकता है।

रात के समय पूजन विधि

तारे निकलने के पश्चात् मिट्टी के छोटे पात्र में थोड़ा सा गंगाजल, थोड़े चावल तथा जल भरा जाता है। इस के चरों तरफ मौली बाँधी जाती है। पीसे हुए कच्चे चावलों से इसे सजाया जाता है। इसी प्रकार मिट्टी का बड़ा पात्र जिसे के झकरा कहते हैं उसे भी सजा कर मौली बाँध ली जाती है। इस को पूरने के लिए सबसे पहले इसमें हल्दी डाली जाती है। फिर कोई फल, मिठाई, पकवान और बच्चों के पसंद की कहने पीने की चीज़े आप इसमें गिन कर 5 या 7 चीज़े रख सकते हैं। इस दौरान चांदी की बनाई अहोई भी राखी जाती है जिसमे हर वर्ष एक नया मोती डलवाया जाता है जिसे “वार्षिक बढ़ोतरी कहते हैं।”रात में तारों के निकलने के बाद पूरा परिवार एक साथ बैठकर अहोई माता का पूजन करते हैं। दीवार पर बनाई गई आकृतियों को तिलक लगाकर माथा टेका जाता है। लकड़ी की चौंकी पर लाल वस्त्र बिछा कर जल पात्र व् झकरा रखा जाता है। चांदी की अहोई को बच्चे के गले में पहनाया जाता है।

बायना कैसे निकाला जाता है

जो महिलाएं अहोई का व्रत रखती है वे एक थाली में अपनी सासु माँ को देने के लिए कोई वस्त्र, फल मिठाई या कुछ रुपय रख कर हाथ में जल लेकर थाली के ऊपर से 2 बार घुमाती हैं। यह मिनसा हुआ बायना कहलाता है। जिसे वह अपनी सासु माँ या फिर अन्य किसी भी बुजुर्ग को दे सकती है।

अर्घ्य विधि

वैसे तो सभी के यहाँ तारों को ही अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है। लेकिन कहीं कहीं चन्द्रमा को अर्घ्य देकर भी व्रत का पारण किया जाता है। कहानी सुनते समय जो जल का पात्र रखा था वह और साथ में चावल व् दुर्बा लेकर तारों का पूजन किया जाता है। उन्हें जल चढ़ाकर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। इसके बाद भोजन ग्रहण किया जाता है। इसी के साथ ही यह अहोई माता का व्रत सम्पूर्ण हो जाता है।
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Priyanka G

Writer | VO Artist | TV Presenter | Entrepreneur

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